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गणतंत्र दिवस सिर्फ उत्सव नहीं, संविधान के मूल्यों को आत्मसात करने का अवसर: अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो

गणतंत्र दिवस सिर्फ उत्सव नहीं, संविधान के मूल्यों को आत्मसात करने का अवसर: अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो

रांची
77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर झारखंड विधानसभा परिसर में आयोजित समारोह में विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो ने संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के मूल्यों को केंद्र में रखते हुए प्रभावशाली संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि 26 जनवरी केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक संकल्प का प्रतीक है, जिसके माध्यम से भारत ने स्वयं को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया।


अध्यक्ष महतो ने अपने भाषण की शुरुआत में सभी माननीय सदस्यों, पूर्व सदस्यों, सचिवालय के पदाधिकारियों, कर्मचारियों, मीडिया प्रतिनिधियों और बच्चों को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने याद दिलाया कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही भारत के नागरिकों ने सदियों की पराधीनता के बाद अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं करने का अधिकार प्राप्त किया।


उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि आसान नहीं थी। इसके पीछे स्वतंत्रता संग्राम की लंबी, कठिन और बलिदानपूर्ण यात्रा रही है। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने केवल राजनीतिक आज़ादी का सपना नहीं देखा, बल्कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित भारत की कल्पना की, जिसे संविधान निर्माताओं ने प्रस्तावना और धाराओं में समाहित किया।


भारतीय लोकतंत्र की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए अध्यक्ष महतो ने कहा कि लोकतंत्र भारत के लिए कोई आयातित विचार नहीं है। वैशाली का गणराज्य, ग्राम सभाओं की परंपरा और सामूहिक निर्णय की संस्कृति इस बात का प्रमाण हैं कि लोकतंत्र हमारी सभ्यता की आत्मा में विद्यमान रहा है। संविधान सभा ने इन्हीं परंपराओं को आधुनिक संवैधानिक ढांचे में ढाला।


उन्होंने संविधान निर्माण की प्रक्रिया को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि विविध मतों, गहन बहसों और व्यापक विचार-विमर्श के बाद सहमति से तैयार किया गया संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध है, जो भारत की विविधता को एक सूत्र में बांधता है।


अध्यक्ष महतो ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के उस ऐतिहासिक वक्तव्य को भी स्मरण किया, जिसमें उन्होंने राजनीतिक समानता के बावजूद सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के बने रहने की चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा कि यह विचार आज भी हमें आत्ममंथन और जिम्मेदारी का बोध कराता है।


झारखंड की धरती के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने तिलका मांझी, सिदो-कान्हू, चाँद-भैरव, फूलो-झानो, नीलांबर-पीतांबर, बुद्धो भगत, विश्वनाथ शाहदेव, गनपत राय, शेख भिखारी और धरती आबा बिरसा मुंडा जैसे वीरों को श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने विदेशी शासन के खिलाफ स्वाभिमान और न्याय की अलख जगाई।


उन्होंने कहा कि आज भारत आर्थिक विकास, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल नवाचार और कूटनीति में वैश्विक पहचान बना चुका है, लेकिन विकास तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। सामाजिक न्याय, समान अवसर और आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान किसी वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि वंचित और हाशिये पर रहे समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने का माध्यम हैं।


अपने संबोधन के अंत में अध्यक्ष महतो ने कहा कि संविधान के 76 वर्ष पूरे होने के बाद यह आवश्यक है कि हम उसके मूल्यों को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उतारें। विविधता में एकता भारत की सबसे बड़ी शक्ति है और इसकी रक्षा करना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। इन्हीं विचारों के साथ उन्होंने सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं।


 

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